गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

5- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अपने बच्चों को आज से ही "गीता" पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिये ताकि उनको गीता पर हाथ रखकर कसम न खानी पड़े।

  "संस्कार ही अपराध को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं"

अघ्याय-1

कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

श्लोक-15

     पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
     पौण्ड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः।।

अर्थ-

     भगवान कृष्ण ने अपना पांचजन्य शंख बजाया तथा अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख बजाया इसके साथ ही अतिभोजी एवं भयानक कार्य करने वाले भीम ने अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

ब्याख्या-

     उपर्युक्त श्लोक में भगवान कृष्ण को हृषीकेश कहा गया है क्योंकि वे ही समस्त इन्द्रियों के स्वामी हैं। सभी जीव उनके ही अंश हैं इसीलिये समस्त जीवों की इन्द्रियां भी भगवान की इन्द्रियों के अंश हैं। जैसा कि निर्विशेषवादी जीवों की इन्द्रियों का कारण बताने में असमर्थ हैं इसीलिये वे जीवों को इन्द्रियरहित या निर्विशेष कहते हैं। भगवान समस्त जीवों के हृदय में वास करके उनकी इन्द्रियों का निर्देशन करते हैं। अतः जीव को उनकी शरण ग्रहण कर लेनी चाहिये, भगवान अपने भक्त की इन्द्रियों का प्रत्यक्ष निर्देशन करते हैं। उपर्युक्त बात के ही समान यहाँ कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान कृष्ण अपने अनन्य भक्त अर्जुन की दिब्य इन्द्रियों का प्रत्यक्ष रूप से निर्देशन करते हैं। साक्षात भगवान द्वारा निर्देशित होने के कारण ही अर्जुन की इन्द्रियों को दिब्य कहा गया है इसीलिये उनको हृषिकेश कहा गया है। भगवान द्वारा किये गये अलग-अलग कार्यों के अनुसार ही भगवान के अलग-अलग नाम हैं। उदाहरण के लिये भगवान का एक नाम देवकी नन्दन भी है क्योंकि उन्होंने देवकी को माता के रूप में स्वीकार किया और उनकी कोख से जन्म लिया, वसुदेव का पुत्र होने के कारण इनका एक नाम वासुदेव भी है, वृन्दावन में यशोदा के साथ बाल-लीलाएं करने और यशोदा द्वारा इनका पालन-पोषण किये जाने के कारण इनका एक नाम यशोदानन्दन भी है, इन्होंने मधु नामक असुर का वध किया था जिसके कारण इनका एक नाम मधुसूदन भी है, गायों को चराने ले जाते हुये ये अपनी बांसुरी से गायों को आनन्द प्रदान करते थे इसीलिये इनका एक नाम गोविन्द भी है, अपने मित्र अर्जुन का सारथी होने के कारण इनका एक नाम पार्थसारथी भी है। इसी प्रकार भगवान का एक नाम हृषिकेष भी है क्योंकि उन्होंने कुरूक्षेत्र के युद्ध स्थल में अर्जुन का निर्देशन किया।
     उपर्युक्त श्लोक में अर्जुन को धनन्जय कहा गया है वो इसलिये कि जब इनके बड़े भाई युधिष्ठिर को विभिन्न यज्ञों को सम्पन्न करने के लिये धन की आवश्यकता हुयी तो उसे प्राप्त करने में अर्जुन ने उनकी सहायता की थी। इसी श्लोक में भीम को वृकोदर कहा गया है क्योंकि वे अधिक खाना खाते थे, और भीम को ही भीमकर्मा अर्थात बड़े कार्य करने वाला भी कहा गया है क्योंकि वो बड़े-बड़े अतिमानवीय कार्य अर्थात जो साधारण मानव से न हो पायें। जैसे हिडिम्बासुर का वध। यहां पर श्रीकृष्ण और अन्य योद्धाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के शंखों के बजाये जाने के कारण पाण्डवों के पक्ष में युद्ध करने वाले सैनिकों के लिये अत्यन्त प्रेरणा प्रदान करने वाला अवसर था। क्योंकि उनके शंख दिब्य शंख थे क्यों भगवान उनके साथ थे। जबकि विपक्ष में ऐसा कुछ भी नहीं था अर्थात न तो भगवान उस ओर थे और न ही भाग्य की देवी श्री ही उनके साथ था। क्योंकि वा धर्म के पक्ष में नहीं थे। अतः इस युद्ध में कौरवों की पराजय पूर्वनिश्चित थी। इसीलिये यहां पर शंखों की ध्वनि भी मानो यही सन्देश दे रही थी कि जहां भगवान हों जय वहीं रहती है।

श्लोक-16

     अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
     नकुलः सहदेवश्च युघोषणिपुष्पकौ।।

अर्थ- 

     कुन्ती पुत्र युधिष्ठर ने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया और नकुल ने सुघोष तथा सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख बजाया।

श्लोक-17

     काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
     धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।

अर्थ-

     श्रेष्ठ धनुष वाले काशीराज, महारथी शिखंडी और धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और कभी पराजित न होने वाले सात्यकि ने अपने-अपने शंख बजाये।

श्लोक-18

     द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
     सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।

अर्थ-

     राजा द्रुपद और द्रौपदी के पांचों पुत्र और बडी भुजाओं वाले सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ने अपने-अपने शंख बजाये।

ब्याख्या-

     धृतराष्ट्र से कुरूक्षेत्र का वर्णन सुनाते हुये संजय ने राजा को सीधे न बताते हुये कुछ चतुराई के साथ बताया कि दुर्योधन की पांडवों को धोखा देने की नीति और राजसिंहासन पर अपने पुत्र को आसीन देखने की आपकी सोच, ये दोनों ही सर्वथा न्यायोचित नहीं थी। युद्ध के आरम्भ के लक्षणों का वर्णन करते हुये उसने अपने बात करने के तरीके से इशारों ही इशारों में धृतराष्ट्र को बताया कि इस महायुद्ध में सारा का सारा कुरूवंश मारा जायेगा। सबसे बुजुर्ग भीष्म पितामह से लेकर अभिमन्यु तथा भीष्म के अन्य पौत्रों सहित विश्व के विभिन्न देशों से युद्ध में भाग लेने आये समस्त राजाओं सहित वहां पर उपस्थित समस्त लोगों का विनाश अवश्यंभावी था। यह सब राजा धृतराष्ट्र की अविवेकपूर्ण नीति और और स्वयं उसकी गलत आकांक्षा के कारण होने जा रहा था, क्योंकि उसने ही अपने पुत्र दुर्योधन की गलत बातों को प्रोत्साहित किया था। वास्तव में इस युद्ध के होने में राजा धृतराष्ट्र का ही सर्वाधिक योगदान था। दुर्योधन के हठ के समक्ष वह आंखों से ही अन्धा नहीं था बल्कि बुद्धि से भी अन्धा हो गया था।


                                                                                                            श्लोक- 19 से आगे अगली पोस्ट में -

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

4- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)


अपने बच्चों को आज से
ही"गीता "पढ़ने के लिए
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उनको गीता पर हाथ
रखकर कसम न खानी 
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"संस्कार ही अपराध
को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं

अघ्याय-1
कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण


श्लोक 11

     अयनेषु च सर्वेषु यथाभगमवस्थिताः।
     भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।

अर्थ-

     इसीलिये सैन्यब्यूह में अपने-अपने मोर्चों पर खड़े रहकर आप सभी भीष्म पितामह को पूरी-पूरी सहायता दें।

ब्याख्या-

     भीष्म पितामह की प्रशंसा करने के बाद दुर्योधन ने सोचा कि कहीं अन्य योद्धा यह न समझ लें कि उन्हें कम महत्व दिया जा रहा है, इसीलिये दुर्योधन ने कूटनीतिक ढ़ंग से स्थिति को संभालने का प्रयास करते हुये उपरोक्त शब्द कहे। उसने कहा कि निःसन्देह भीष्म पितामह एक महान योद्धा हैं लेकिन चूंकि अब वे वृद्ध हो चुके हैं इसीलिये प्रत्येक योद्धा को ये चाहिये कि वह चारों ओर से उनकी सुरक्षा करें। इसके साथ ही दुर्योधन को यह भी डर सता रहा था कि हो सकता है कि भीष्म किसी एक दिशा में युद्ध करें ओर दूसरी ओर से शत्रु सेना आक्रमण कर दे। अतः इस स्थिति के लिये उसने कहा कि सभी सैनिक अपने-अपने मोर्चे पर अडिग रहे और शत्रु की सेना को ब्यूह न तोड़ने दे। दुर्योधन जानता था कि जब तक भीष्म उपस्थित है तब तक उसकी सेना को कोई पराजित नहीं कर सकता। दुर्योधन को यह विश्वास था कि भीष्म और द्रौण पूरी तरह उसके साथ निष्टा दिखायेंगे क्योंकि वो दोनो अपने प्रतिज्ञा और धर्म के कारण उससे बधे हुये थे। इसके साथ उसने यह भी देखा था कि जब द्रोपदी का वस्त्र हरण हो रहा था तो उसके सहायता मांगने के बाद भी इन दोनों के मुंह से एक शब्द नहीं कहा था। हालांकि दुर्योधन ये भली प्रकार से जानता था कि इन दोनों सेनापतियों के मन में पाण्डवों के लिये अथाह प्रेम था फिर भी उसे यह आशा थी कि ये दोनों पाण्डवों के प्रति प्रेम को ठीक उसी प्रकार से त्याग देंगे जिस प्रकार से उन्होंने द्युत-क्रीणा के समय त्यागा था।

श्लोक-12

     तस्य सन्जनयन्हर्ष कुरूवृद्धः पितामहः।
     सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ प्रतापवान््।।

अर्थ-

     तब कुरूवंश के वयोवृद्ध प्रतापी एवं वृद्ध पितामह ने सिंह गर्जना की ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर में बजाया, जिससे दुर्योधन को काफी खुशी हुई।

ब्याख्या-

     भीष्म पितामह दुर्योधन की मनोस्थिति को समझ गये और उन्होंने उसके प्रति दया भाव दिखाते हुये, जो कि वो अपनी मजबूरी के कारण दिखा रहे थे, के कारण उसे प्रसन्न करने के लिये काफी उच्च स्वर में अपना शंख बजाया, जिसकी ध्वनि सिंह की भाँति प्रतीत हो रही थी। यहाँ पर अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने दुर्योधन को बता दिया कि उन्हें युद्ध में विजय की आशा नहीं है क्योंकि दूसरी ओर साक्षात् भगवान खड़े हैं फिर भी युद्ध करना यहाँ पर उनका कर्तब्य है और वे अपनी ओर से उसमें कोई कसर नहीं छोड़ेगे। दुर्बुद्धि दुर्योधन के प्रसन्न होने के लिये ये पर्याप्त था। क्योंकि धर्म के मार्ग और स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति के प्रति वो जानना ही नहीं चाहता था।

श्लोक-13

     ततः  शंखश्च  भेर्यश्च  पणवानकगोमुखाः।
     सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोअभवत्।।

अर्थ-

उसके तुरन्त बाद शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा सींग सहसा एकसाथ बज उठे। सभी के एक साथ बजने के कारण स्वर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण था।

श्लोक-14

     ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
     माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः।।

अर्थ-

     दूसरी और से श्वेत घोड़ो के द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।

ब्याख्या-

     इससे पहले भीष्म पितामह के शंख को दिब्य नहीं कहा गया जबकि कृष्ण और अर्जुन के शंखों को उसकी तुलना में दिब्य कहा गया है। दिब्य शंख नाम देने से ही यहाँ पर यह सि़द्ध हो रहा है कि दूसरे पक्ष के विजय होने की कोई आशा नहीं थी क्योंकि स्वयं त्रिलोकी नाथ भगवान कृष्ण पाण्डवों के साथ थे। जय हमेशा ही पाण्डव जैसों की ही होती है क्योंकि भगवान कृष्ण उनके साथ होते हैं। इसके साथ ही जहाँ भगवान होते हैं, वहीं पर लक्ष्मी जी भी रहती हैं क्योंकि लक्ष्मी जी हमेशा ही अपने पति के साथ रहती हैं। अतः भगवान कृष्ण के दिब्य शंख से उत्पन्न ध्वनि द्वारा यह सूचना दी जा रही है कि विजय तथा श्री दोनों ही पाण्डवों के साथ है और उनकी प्रतीक्षा कर रही है। इसके साथ-साथ जिस रथ में भगवान कृष्ण और अर्जुन आशीन थे वह रथ अर्जुन को अग्नि देवता द्वारा दिया गया था। इससे भी यह सूचना मिल रही थी कि  जहाँ भी यह रथ जायेगा, विजय उसके साथ ही होगी। इन सब बातों के कारण ही भगवान कृष्ण और अर्जुन के शंख को दिब्य कहा गया है जबकि पितामह भीष्म के शंख को दिब्य नहीं कहा गया है, क्योंकि मजबूरी वश ही सही वो धर्म के साथ नहीं थे।

                                                                                                       श्लोक- 15 से आगे अगली पोस्ट में -

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

3- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)


अपने बच्चों को आज से
ही"गीता "पढ़ने के लिए
प्रेरित कीजिये ताकि
उनको गीता पर हाथ
रखकर कसम न खानी 
पड़े। 
"संस्कार ही अपराध

को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं 

श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अघ्याय-1

कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

श्लोक-5

     धुष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान।
     पुरूजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः।।

अर्थ-

     इनके साथ ही धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरूजित्, कुन्तिभोज तथा शैब्य जैसे महान शक्तिशाली योद्धा भी हैं।

ब्याख्या-

     वास्तव में दुर्योधन जो कि पांडवों की ब्यूह रचना देखकर अत्यधिक भयभीत हो चुका था वह जब पांडवो की सेना के अनेक शूरवीरों को देखकर और भी अधिक भयभीत हो रहा था। द्रौणाचार्य भी पांडवों की ब्यूह रचना को देख रहे थे, लेकिन दुर्योधन ये सब अपने भय के कारण उनको बता रहा था कि ये-2 योद्धा पांडवों की ओर से युद्ध करने के लिये आये हुये हैं।

श्लोक-6

     युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान।
     सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।

अर्थ-

     पराक्रमी युधामन्यु, अत्यन्त शक्तिशाली उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र तथा द्रौपदी के पुत्र ये सभी महारथी हैं।

श्लोक-7

     अस्माकं जु विशिष्टा से तातत्रबोध द्विजोत्तम।
     नायका मम  सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते।।

अर्थ-

     किन्तु हे आचार्य! आपकी सुचना के लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के विषय में बताना चाहुँगा जो मेरी सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं।

श्लोक-8

     भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिन्जयः।
     अश्वत्थामा विकण्र्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।

अर्थ-

     मेरी सेना में स्वयं आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरीश्रवा आदि हैं जो युद्ध में सदैव विजयी रहे हैं।

ब्याख्या-

     अपने डर पर काबू पाते हुये दुर्योधन अपना ध्यान अपनी सेना की ओर खींचता है और उनका उल्लेख करता है कि वो हमेशा यु़द्ध में विजयी होते रहे हैं। यहाँ पर दुर्योधन का अपनी सेना में उपस्थित शूरवीरों का उल्लेख करने का आशय अपने पक्ष को पाण्डवों के पक्ष से तुलना करने से है। दुर्योधन से भलीभाँति जानता है कि युद्ध शुरू होने में अब कुछ ही समय बाकी है और अब युद्ध होना अवश्यंभावी है और वो चाहता भी यही है, लेकिन पाण्डवों की ब्यूह रचना को देखकर उसके अंदर जो डर की भावना आ चुकी थी वो उस पर काबू पाना चाह रहा था। अन्यथा युद्धभूमि में द्रौणाचार्य से इस प्रकार की बातें करने का कोई आशय नहीं था।

श्लोक-9

     अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
     नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।।

अर्थ-

     मेरी सेना में ऐसे अन्य अनेक वीर भी हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने के लिए हमेशा तैयार हैं। ये अनेक प्रकार के हथियारों से सुसज्जित हैं और युद्धविद्या में काफी निपुण हैं।

ब्याख्या-

     वास्तव में दुर्योधन की सेना में अन्य भी कई योद्धा जैसे-जयद्रथ, कृतवर्मा, शल्य तथा दुर्योधन के अन्य भाई उसके लिये अपने प्राणों की आहुति देने के लिये हमेशा तत्पर रहते थे अर्थात् कुछ भी कर गुजरने के लिये तत्पर थे। लेकिन यहाँ पर तो यह पूर्वनिश्चित है कि ये सभी योद्धा इस समय अधर्मी दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने के कारण इनका कुरूक्षेत्र के युद्ध में मारा जाना अवश्यंभावी है। यहाँ पर अपने सभी मित्रों व अन्य योद्धाओं की सम्मिलित शक्तियों के कारण दुर्योधन अपनी विजय के प्रति आश्वस्त था।

श्लोक-10

     अपर्याप्त तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
     पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।।

अर्थ-

     हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभाँति संरक्षित हैं, जबकि पाण्डवों की शक्ति भीम द्वारा संरक्षित होकर भी सीमित है।

ब्याख्या-

     श्लोक में दुर्योधन ने अपनी और पाण्डवों की तुलनात्मक शक्ति का अनुमान प्रस्तुत किया है। वह सोचता है कि अनुभवी भीष्म के द्वारा संरक्षित होने के कारण उसकी सेना की शक्ति अनन्त है। दूसरी ओर पाण्डवों की सेनाओं की शक्ति को वह सीमित बता रहा है, क्योंकि वहाँ की सुरक्षा का दायित्व एक कम अनुभवी सेनानायक भीम के ऊपर है जिसका अनुभव भीष्म की तुलना में नगण्य है। दुर्योधन की बुद्धि वास्तव में धर्म के क्षेत्र में ज्ञान नहीं रखती थी। उसे यह ज्ञान ही नहीं था कि धर्म का पक्ष किसके साथ है और तीनों लोकों के पालनहार भगवान विष्णु स्वयं पाण्डवों के पक्ष में खड़े हैं, और वो जहाँ पर होंगे जय उनके साथ ही होगी। बस वो समझ रहा था कि तुलनात्मक शक्ति उसके साथ है इसीलिये वो ही विजय होगा। दुर्योधन जो कि सदैव भीम से ईष्र्या करता था क्योंकि वह जानता था कि यदि उसकी कभी मृत्यु होगी तो वो भीम के हाथों ही होगी। यहाँ पर वह अपने आप को विश्वास दिला रहा था और साथ ही अपने गुरू द्रोणाचार्य को कि भीष्म की उपस्थिति में उसकी विजय निश्चित है क्योंकि भीष्म, भीम की तुलना कहीं अधिक अनुभवी सेनापति हैं।

                                                                                                             श्लोक-11 से आगे अगली पोस्ट में -

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

2- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)




अपने बच्चों को आज सेही"गीता "पढ़ने के लिएप्रेरित कीजिये ताकिउनको गीता पर हाथरखकर कसम न खानी
पड़े। "संस्कार ही अपराधको रोक सकते हैं प्रशासन नहीं 

श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अघ्याय-1

कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

श्लोक-2

संजय उचाव

     दृष्टा तु पाण्डवानीकं ब्यूढं दुर्योधनस्तदा।
     आचार्यमुपसंगम्य   राजा  वचनमब्रवीत्।।

अर्थ-

     संजय ने कहा-हे राजन! पाण्डुपुत्रों द्वारा सेना की व्यूहरचना देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरू के पास गया और उसने ये शब्द कहे।

ब्याख्या-

     धृतराष्ट्र जन्म से अन्धा था। दुर्भाग्यवश वह आध्यात्मिक दृष्टि से भी वंचित था। वह यह जानता था कि उसी के समान उसके पुत्र भी धर्म के मामले में अन्धे हैं और उसे विश्वास था कि वे पाण्डवों के साथ कभी भी समझौता नहीं कर पायेंगे। इसके साथ वह यह भी जानता था कि पांडव जन्म से ही पवित्र थे और हमेशा ही धर्म का मार्ग अपनाते थे। होने वाले युद्ध के परिणाम के विषय में भी वो अनभिज्ञ नहीं था। इसीलिये वो संशयित ब्यक्ति की भाँति संजय से प्रश्न कर रहा था और निराश भी था। इसलिये संजय युद्धभूमि की स्थित के विषय में उसके मंतव्य को समझ गया। अतः वह निराश राजा को प्रोत्साहित करना चाह रहा था। उसने राजा को बताया कि उसका पुत्र दुर्योधन पाण्डवों की ब्यूह रचना देखकर तुरन्त अपने सेनापति द्रोणाचार्य को वास्तविक स्थिति से अवगत कराने गया। यहाँ पर दुर्योधन को राजा कहकर सम्बोधित किया गया है फिर भी स्थिति की गम्भीरता के कारण उसे सेनापति के पास जाना पड़ा। वास्तविक बात तो यह थी कि पाण्डवों की ब्यूह रचना देखकर दुर्योधन अपने भय को छिपा नहीं पाया।

श्लोक 3

     पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
     ब्युढां  द्रुपदपुत्रेण तव  शिष्येण धीमता।।

अर्थ-

      हे आचार्य! पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना की ओर देखिये, जिसे आपके अत्यंत बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने इस कौशल के साथ व्यवस्थित किया है।

ब्याख्या-

    यहाँ पर दुर्योधन का वास्तविक आशय अपने सेनापति द्रौणाचार्य के दोषों को इंगित करना था। अर्जुन की पत्नि द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद, जो कि धृष्टद्युम्न के पिता भी थे, के साथ द्रोणाचार्य का राजनीतिक झगड़ा था। इस झगड़े के कारण राजा द्रुपद ने एक महान यज्ञ सम्पन्न किया। इस यज्ञ के बाद उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्ति का वरदान मिला जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। हालांकि द्रौणाचार्य इस बात से भलीभाँति परिचित थे किन्तु जब द्रुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न युद्ध की शिक्षा प्राप्त करने के लिये द्रोणाचार्य के पास आया तो द्रोणाचार्य ने अपने धर्म का पालन करते हुये उसे अपने सारे सैनिक रहस्य देने में कोई झिझक नहीं हुई। इस युद्ध में धृष्टद्युम्न पाण्डवों के पक्ष से युद्ध कर रहा था और उन्हीं विद्याओं का प्रयोग कर रहा था जो उसने द्रौणाचार्य से सीखी थी। दुर्योधन ये कहकर कटाक्ष करना चाह रहा था वह समझता था कि धर्म का पालन करना द्रोणाचार्य की दुर्बलता रही होगी। इस कटाक्ष के द्वारा दुर्योधन यह भी कहना चाह रहा था कि कहीं वह अपने प्रिय पाण्डवों के प्रति युद्ध में उदारता न दिखा बैठे। विशेष रूप से अर्जुन के प्रति क्योंकि अर्जुन उनका प्रिय एवं तेजस्वी शिष्य था। दुर्योधन ने यह भी चेतावनी दी कि युद्ध में किसी प्रकार की उदारता से हार भी हो सकती है।

श्लोक 4

     अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
     युयुधानों  विराटश्च  द्रुपदश्च महारथः।।

अर्थ-

     इस सेना में भीम व अर्जुन के समान युद्ध करने वाले अनेक वीर-जैसे महारथी युुयुधान, विराट तथा द्रुपद आदि योद्धा हैं।

ब्याख्या-

     युद्धकला में द्रौणाचार्य की शक्ति के समक्ष कोई भी योद्धा बाधक नहीं था लेकिन दुर्योधन का आंतरिक भय उसे ये सब बताने को बाध्य कर रहा था। और वो अपने विजय पथ पर इनको अत्यन्त बाधक मान रहा था। दुर्योधन भीम और अर्जुन की शक्ति जिससे पार नहीं पाया जा सकता उससे परिचित था इसीलिये वह इनसे अन्य योद्धाओं की तुलना कर रहा था।

                                                                                                  श्लोक- 5 से आगे अगली पोस्ट में -

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

1- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अपने बच्चों को आज से ही"गीता "पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिये ताकि उनको गीता पर हाथ रखकर कसम न खानी  पड़े। "संस्कार ही अपराध को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं " 


श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अघ्याय-1
कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण


श्लोक-1

 धृतराष्ट्र उचाव-

        धर्मक्षेत्रे  कुरूक्षेत्रे  समवेता   युयुत्सवः।
        ममकाः पाण्डवाच्श्रैव किमकुर्वत संजय।।

अर्थ -

        धृतराष्ट्र ने कहा- 

        हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

ब्याख्या -

      भगवद्गीता एक आस्तिक विज्ञान है। इसको पढते समय मनुष्य को चाहिये कि वह श्रीकृष्ण के भक्त की सहायता लेते हुए गीता का अध्ययन करे और स्वार्थ की भावना को त्यागते हुए उसे समझने का प्रयास करे। अर्जुन ने जिस प्रकार साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण से गीता सुनी और उसका उपदेश ग्रहण किया, इस प्रकार की स्पष्ट अनुभूति का उदाहरण भगवद्गीता में ही है। यदि उसी गुरू परम्परा से, निजि स्वार्थ से प्रेरित हुए बिना, किसी को भगवद्गीता समझने का सौभाग्य प्राप्त हो तो वह समस्त वैदिक ज्ञान तथा विश्व के समस्त शास्त्रों के अध्ययन को पीछे छोड़ देता है। पढ़ने वाले को गीता में न सभी शास्त्रों की बातें मिलेंगी अपितु ऐसी बातें भी मिलेंगी जो अन्य कहीं उपलब्ध नहीं हैं। यही गीता की विशिष्टता है। चूंकि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा साक्षात् कही गयी है, इसी कारण यह एक आस्तिक विज्ञान है।
       महाभारत में संजय व धृतराष्ट्र की वार्ता इस महान गीता दर्शन के मूल सिद्धान्त का कार्य करती हैं। माना जाता है कि इसका प्रवचन मूल में भगवान के मुखारबिन्दु से मानव जाति के पथ प्रदर्शन के लिये तब किया गया जब भगवान श्रीकृष्ण के रूप में इस जग में उपस्थित थे।
       इस श्लोक में धर्मक्षेत्रे शब्द एक सार्थक शब्द है, क्योंकि कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन के पक्ष में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उपस्थित थे। कौरवों के पिता धृतराष्ट्र अपने पुत्रों की विजय की सम्भावना के लिये अत्यधिक संदिग्ध था। अतः इसी सन्देह के कारण उसने अपने सचिव संजय से पूछा, ‘‘उन्होंने क्या किया?’’ वह आश्वस्त था कि उसके पुत्र तथा उसके छोटे भाई के पुत्र कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में निर्णयात्मक संग्राम के लिए एकत्र हुए हैं। यहां पर उसकी जिज्ञासा सार्थक है। वह नहीं चाहता था कि भाइयों में कोई समझौता हो, अतः वह युद्धभूमि में अपने पुत्रों के भाग्य के विषय में आश्वस्त होना चाह रहा था।
       इस युद्ध को कुरूक्षेत्र में लड़ा जाना था, जिसको वेदों में स्वर्ग के निवासियों के लिये भी तीर्थस्थल के रूप में हुआ है। धृतराष्ट्र को अच्छी तरह ज्ञात था कि इसका प्रभाव अर्जुन और उसके अन्य भाईयों पर प्रतिकूल पड़ेगा क्योंकि वे स्वभाव से पुण्यात्मा थे।
       संजय ब्यास जी का शिष्य था, अतः उनकी कृपा से संजय धृतराष्ट्र के कक्ष में बैठे-2 ही कुरूक्षेत्र का सारा दृष्य देख सकता था। इसीलिये उससे धृतराष्ट्र ने युद्धस्थल के बारे में पूछा।
       पाण्डव तथा कौरव दोनों एक ही वंश के थे। यहाँ पर धृतराष्ट्र के शब्दों से ही उसका मनोभाव का पता लगता है।उसने जान-बूझ कर अपने पुत्रों को कुरु कहा और पाण्डु के पुत्रों को वंश के उत्तराधिकार से विलग कर दिया।इस प्रकार अपने भतीजों के साथ धृतराष्ट्र की विशिष्ट मनोस्थिति समझी जा सकती है। 
       धृतराष्ट्र यह भली भाँति जानता था कि कुरूक्षेत्र में धर्म के पिता के रूप में भगवान श्रीकृष्ण विद्यमान हैं और वो अधर्म को ठीक वैसे ही नष्ट कर देंगे जैसे धान के खेत से बेकार की घास को किसान जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर देता है। लेकिन यहाँ पर उसका पु़त्र मोह उसे इस सत्य को जो कि वह जानता था उसे मानने में संशय पैदा करवा रहा था।
               
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