गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

5- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अपने बच्चों को आज से ही "गीता" पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिये ताकि उनको गीता पर हाथ रखकर कसम न खानी पड़े।

  "संस्कार ही अपराध को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं"

अघ्याय-1

कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

श्लोक-15

     पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
     पौण्ड्र दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः।।

अर्थ-

     भगवान कृष्ण ने अपना पांचजन्य शंख बजाया तथा अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख बजाया इसके साथ ही अतिभोजी एवं भयानक कार्य करने वाले भीम ने अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

ब्याख्या-

     उपर्युक्त श्लोक में भगवान कृष्ण को हृषीकेश कहा गया है क्योंकि वे ही समस्त इन्द्रियों के स्वामी हैं। सभी जीव उनके ही अंश हैं इसीलिये समस्त जीवों की इन्द्रियां भी भगवान की इन्द्रियों के अंश हैं। जैसा कि निर्विशेषवादी जीवों की इन्द्रियों का कारण बताने में असमर्थ हैं इसीलिये वे जीवों को इन्द्रियरहित या निर्विशेष कहते हैं। भगवान समस्त जीवों के हृदय में वास करके उनकी इन्द्रियों का निर्देशन करते हैं। अतः जीव को उनकी शरण ग्रहण कर लेनी चाहिये, भगवान अपने भक्त की इन्द्रियों का प्रत्यक्ष निर्देशन करते हैं। उपर्युक्त बात के ही समान यहाँ कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान कृष्ण अपने अनन्य भक्त अर्जुन की दिब्य इन्द्रियों का प्रत्यक्ष रूप से निर्देशन करते हैं। साक्षात भगवान द्वारा निर्देशित होने के कारण ही अर्जुन की इन्द्रियों को दिब्य कहा गया है इसीलिये उनको हृषिकेश कहा गया है। भगवान द्वारा किये गये अलग-अलग कार्यों के अनुसार ही भगवान के अलग-अलग नाम हैं। उदाहरण के लिये भगवान का एक नाम देवकी नन्दन भी है क्योंकि उन्होंने देवकी को माता के रूप में स्वीकार किया और उनकी कोख से जन्म लिया, वसुदेव का पुत्र होने के कारण इनका एक नाम वासुदेव भी है, वृन्दावन में यशोदा के साथ बाल-लीलाएं करने और यशोदा द्वारा इनका पालन-पोषण किये जाने के कारण इनका एक नाम यशोदानन्दन भी है, इन्होंने मधु नामक असुर का वध किया था जिसके कारण इनका एक नाम मधुसूदन भी है, गायों को चराने ले जाते हुये ये अपनी बांसुरी से गायों को आनन्द प्रदान करते थे इसीलिये इनका एक नाम गोविन्द भी है, अपने मित्र अर्जुन का सारथी होने के कारण इनका एक नाम पार्थसारथी भी है। इसी प्रकार भगवान का एक नाम हृषिकेष भी है क्योंकि उन्होंने कुरूक्षेत्र के युद्ध स्थल में अर्जुन का निर्देशन किया।
     उपर्युक्त श्लोक में अर्जुन को धनन्जय कहा गया है वो इसलिये कि जब इनके बड़े भाई युधिष्ठिर को विभिन्न यज्ञों को सम्पन्न करने के लिये धन की आवश्यकता हुयी तो उसे प्राप्त करने में अर्जुन ने उनकी सहायता की थी। इसी श्लोक में भीम को वृकोदर कहा गया है क्योंकि वे अधिक खाना खाते थे, और भीम को ही भीमकर्मा अर्थात बड़े कार्य करने वाला भी कहा गया है क्योंकि वो बड़े-बड़े अतिमानवीय कार्य अर्थात जो साधारण मानव से न हो पायें। जैसे हिडिम्बासुर का वध। यहां पर श्रीकृष्ण और अन्य योद्धाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के शंखों के बजाये जाने के कारण पाण्डवों के पक्ष में युद्ध करने वाले सैनिकों के लिये अत्यन्त प्रेरणा प्रदान करने वाला अवसर था। क्योंकि उनके शंख दिब्य शंख थे क्यों भगवान उनके साथ थे। जबकि विपक्ष में ऐसा कुछ भी नहीं था अर्थात न तो भगवान उस ओर थे और न ही भाग्य की देवी श्री ही उनके साथ था। क्योंकि वा धर्म के पक्ष में नहीं थे। अतः इस युद्ध में कौरवों की पराजय पूर्वनिश्चित थी। इसीलिये यहां पर शंखों की ध्वनि भी मानो यही सन्देश दे रही थी कि जहां भगवान हों जय वहीं रहती है।

श्लोक-16

     अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
     नकुलः सहदेवश्च युघोषणिपुष्पकौ।।

अर्थ- 

     कुन्ती पुत्र युधिष्ठर ने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया और नकुल ने सुघोष तथा सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख बजाया।

श्लोक-17

     काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
     धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।

अर्थ-

     श्रेष्ठ धनुष वाले काशीराज, महारथी शिखंडी और धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और कभी पराजित न होने वाले सात्यकि ने अपने-अपने शंख बजाये।

श्लोक-18

     द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
     सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।

अर्थ-

     राजा द्रुपद और द्रौपदी के पांचों पुत्र और बडी भुजाओं वाले सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ने अपने-अपने शंख बजाये।

ब्याख्या-

     धृतराष्ट्र से कुरूक्षेत्र का वर्णन सुनाते हुये संजय ने राजा को सीधे न बताते हुये कुछ चतुराई के साथ बताया कि दुर्योधन की पांडवों को धोखा देने की नीति और राजसिंहासन पर अपने पुत्र को आसीन देखने की आपकी सोच, ये दोनों ही सर्वथा न्यायोचित नहीं थी। युद्ध के आरम्भ के लक्षणों का वर्णन करते हुये उसने अपने बात करने के तरीके से इशारों ही इशारों में धृतराष्ट्र को बताया कि इस महायुद्ध में सारा का सारा कुरूवंश मारा जायेगा। सबसे बुजुर्ग भीष्म पितामह से लेकर अभिमन्यु तथा भीष्म के अन्य पौत्रों सहित विश्व के विभिन्न देशों से युद्ध में भाग लेने आये समस्त राजाओं सहित वहां पर उपस्थित समस्त लोगों का विनाश अवश्यंभावी था। यह सब राजा धृतराष्ट्र की अविवेकपूर्ण नीति और और स्वयं उसकी गलत आकांक्षा के कारण होने जा रहा था, क्योंकि उसने ही अपने पुत्र दुर्योधन की गलत बातों को प्रोत्साहित किया था। वास्तव में इस युद्ध के होने में राजा धृतराष्ट्र का ही सर्वाधिक योगदान था। दुर्योधन के हठ के समक्ष वह आंखों से ही अन्धा नहीं था बल्कि बुद्धि से भी अन्धा हो गया था।


                                                                                                            श्लोक- 19 से आगे अगली पोस्ट में -

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