
अपने बच्चों को आज से ही "गीता" पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिये ताकि उनको गीता पर हाथ रखकर कसम न खानी पड़े।
"संस्कार ही अपराध को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं।"
अघ्याय-1
कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण
श्लोक-19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोभ्यनुनादयन्।।
अर्थ-
इन समस्त शंखों की ध्वनि काफी विशाल ध्वनि बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय को विदीर्ण करने लगी।
ब्याख्या-
इससे पूर्व भीष्म और अन्य कुरू सेना के लोगों के द्वारा भी शंख बजाये जाने का उल्लेख हुवा है लेकिन कहीं पर भी ये उल्लेख नहीं हुवा है कि इससे पांडवों के हृदय विदीर्ण हुए हो जबकि जब पांडवों द्वारा शंख बजाये गये तो कौरवों के हृदय विदीर्ण होने का उल्लेख मिलता है। इसका कारण कि पांडवों पर इसका कोई असर नहीं हुआ वो पांडवों का भगवान श्रीकृष्ण में पूर्ण विश्वास था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि कोई ब्यक्ति पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु की शरण में जाता है उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहता। चाहे कितनी ही विपरीत परिस्थिति हो या कितनी भी विपत्ति आ जाय। ऐसा नहीं है कि पांडवों के ऊपर भगवान पर विश्वास करने के बाद विपत्ति नहीं आयी। विपत्तियां आई, साथ में उनको सहन करने व उन पर विजय हासिल करने का विश्वास व शक्ति भगवान की कृपा से ही उनको प्राप्त हुई।
श्लोक-20
अथ व्यवस्थितान्दृष्टा धर्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरूद्यम्य पाण्डवः।।
अर्थ-
उसी समय हनुमान की ध्वजा लगे रथ पर सवार पाण्डुपुत्र अर्जुन अपना धनुष उठाकर बाण चलाने की मुद्रा मे आये। और हे राजन्-कौरवों को युद्धभूमि में खडा देखकर अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से ये शब्द कहे।
ब्याख्या-
जैसा कि युद्ध शुरू होने ही वाला था। युद्ध शुरू होने के लिये शंख भी बज चुके थे। अभी तक के विवेचन से यह ज्ञात हो चुका है कि कौरव, पांडवों की ब्यूह रचना को देखकर काफी भयभीत हो रहे थे। यहां पर पाण्डवों का निर्देशन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कर रहे थे। पांडवों की पूरी सेना का कृष्ण पर पूरा विश्वास था। जबकि दूसरी ओर का निर्देशन भीष्म जैसा योद्धा कर रहा था लेकिन दुर्योधन के मन में उनके प्रति, पांडवों जैसा विश्वास नहीं था, स्वयं दुर्योधन ही उन पर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि वह पांडवों के साथ अपनी पूर्ण क्षमता के साथ युद्ध कर पायेंगे या नहीं। दूसरी ओर अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्वयं हनुमान जी विराजमान थे जो कि विजय के प्रतीक थे, जैसा राम व रावण के युद्ध में हनुमान जी भगवान राम के साथ थे और उनको विजय प्राप्त हुई थी। वैसे भी जहाँ पर राम हो वहाँ उनके परमभक्त हनुमान रहते हैं। भगवान राम और कृष्ण दोनों ही साक्षात विष्णु के अवतार थे। अर्जुन जब श्रीकृष्ण से युद्ध के लिये सहायता मांगने आये तो उसी समय दुर्योधन भी श्रीकृष्ण सहायता मांगने पहुँचा था। अर्जुन से पहले मांगने के लिये कहा गया तो जब उसने भगवान का सानिध्य मांगा, ये सुनकर दुर्योधन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि वो तो भगवान श्रीकृष्ण की नारायणी सेना को ही चाहता था। श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन से पूछा कि उसने आखिर क्यों उनका सानिध्य चाहा वो भी तब जब वो बता चुके थे कि वो किसी प्रकार का शस्त्र नहीं उठायेंगे। तब अर्जुन ने कहा हे भगवन आपका साथ मुझे युद्ध भूमि में भटकने नहीं देगा और मुझे पूर्ण मार्गदर्शन मिलता रहेगा। ये बात उसकी भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाती है। ये सारी ही बातें अर्जुन की विजय की ओर संकेत कर रही थी। अभी तक के वृतांत में कही पर भी यह प्रतीत नहीं होता कि पाण्डव के मन में युद्ध को लेकर किसी भी प्रकार का भय था और न ही भय करने का कोई कारण था, क्योंकि भगवान प्रत्यक्ष रूप से उनके साथ थे और उनमें उनका पूर्ण विश्वास था।
श्लोक- 21 से आगे अगली पोस्ट में -
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