बुधवार, 14 नवंबर 2018

8- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अपने बच्चों को आज से ही "गीता" पढ़ने के लिए प्रेरित कीजिये ताकि उनको गीता पर हाथ रखकर कसम न खानी पड़े।

  "संस्कार ही अपराध को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं"

अघ्याय-1

कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

श्लोक-24

संजय उचाव-

एवमुक्तो    हृषिकेशो   गुडाकेशेन    भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।

अर्थ-

संजय ने कहा-हे धृतराष्ट्र, अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया।

ब्याख्या-

यहाँ पर अर्जुन को गुडाकेश कहा गया है। गुडाकेश का अर्थ है कि जो नींद को जीत ले। यहाँ पर नींद से तात्पर्य अज्ञान से है क्योंकि नींद का एक अर्थ अज्ञान भी होता है। अर्जुन ने भगवान से मित्रता के कारण अज्ञान पर विजय प्राप्त की थी। भगवान श्रीकृष्ण से मित्रता व उनकी भक्ति के कारण वह भगवान को क्षण भर भी नहीं भूलता था। यही भक्त का स्वभाव होता है कि वह अपने स्वामी को हमेशा याद करता रहता है- चलते, फिरते, सोते-जागते, किसी भी समय भक्त अपने स्वामी के चिन्तन से मुक्त नहीं रह सकता। अतः अर्जुन ने सोते-जागते और हर समय श्रीकृष्ण का चिंतन करते हुये अपनी नींद और अज्ञान दोनों को जीत लिया था। जैसा कि श्रीकृष्ण प्रत्येक जीव के स्वामी हैं तो वो अर्जुन के मंतब्य को समझ गये थे कि वो क्यों दोनों सेनाओं के मध्य रथ को ले जाना चाहता है। अतः उन्होंने वैसा ही किया और दोनों सेनाओं के बीच में रथ ले जाकर खड़ा कर दिया।

श्लोक-25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उचाव   पार्थ     पश्यैन्समवेतान्कुरूनीति।।

अर्थ-

भीष्म, द्रोण और सारे विश्व भर से आये योद्धाओं के सामने रथ रोकते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-हे पार्थ! यहाँ पर एकत्र हुये सारे कौरवों को देख।

ब्याख्या-

जैसा कि समस्त जीवों के स्वामी होने के कारण श्रीकृष्ण यह जानते थे कि अर्जुन के मन में क्या चल रहा है। यहाँ पर श्रीकृष्ण के लिये हृषिकेश शब्द का प्रयोग हुवा है जिसका अर्थ है कि वो सब कुछ जानने वाले हैं। इसी तरह अर्जुन के लिये पार्थ शब्द का भी प्रयोग हुवा है जिसका अर्थ है-पृथा या कुन्तीपुत्र। मित्र के रूप में अर्जुन श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन पृथा क ा पुत्र था इसीलिये उन्होंने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया था। अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कौरवों की ओर देखो कहा तो उसका क्या अभिप्राय था? क्या अर्जुन युद्ध नहीं करना चाह रहा था उन्होंने अपने मित्र अर्जुन की मनः स्थिति की पूर्वसूचना परिहास के रूप में दी थी।

श्लोक-26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः  पितृनथ   पितामहान।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव                 सेनयोरुभयोरपि।।

अर्थ-

इसके उपरान्त अर्जुन दोनों ही सेनाओं में स्थित हुए अपने चाचा-ताऊओं, पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाईयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, ससुरों और अपने शुभचिंतकों को देखा।

ब्याख्या-

अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने सभी सम्बन्धियों को देखा। उसने अपने पिता के समकक्ष भूरिश्रवा जैसे लोगों को देखा, भीष्म तथा सोमदत्त जैसे पितामहों, द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्य जैसे गुरुओं, शल्य तथा शकुनि जैसे मामाओं, दुर्योधन व अन्य कुरुओं जैसे भाईयों, अश्वत्थामा जैसे मित्रों और कृतवर्मा जैसे शुभचिन्तकों को देखा। इनके अलावा भी उसने अपने अनेक मित्रों और सगे-सम्बन्धियों को देखा।

श्लोक-27

तान्समीक्ष्य स कौनतेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।
कृपया        परयाविष्टो          विषीदत्रिदमब्रवीत्।।

अर्थ-

इस प्रकार युद्धभूमि में खड़े हुए अपने संपूर्ण बंधु-बांधवों को देखकर अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करता हुवा बोला।

श्लोक-28

अर्जुन उचाव-

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति  मम  गात्राणि मुखं  च  परिशुष्यति।।

अर्थ-

अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! इस प्रकार से यु़द्ध की इच्छा रखने वाले अपने मित्रों तथा स्वजनों को देखकर मेरे शरीर के अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख भी सूख रहा है।

ब्याख्या-

भक्ति से युक्त मनुष्य में वे सारे सद्गुण रहते हैं जो सत्पुरुषों या देवताओं में पाये जाते हैं, जिनको ईश्वरीय गुण कहते हैं, इसके विपरीत जो भक्त न हो वो अपनी शिक्षा व संस्कृति के द्वारा कितना भी उन्नत क्यों न हो इन ईश्वरीय गुणों से विहीन होता है। इसी कारण स्वजनों, मित्रों और संबन्धियों को युद्धभूमि में देखकर अर्जुन उन सब के लिये करुणा से अभिभूत हो गया, जिन्होंने युद्ध करने का निश्चय किया था। अर्जुन अपने सैनिकों के लिये तो प्रारम्भ से ही दयालु था लेकिन अपने शत्रु पक्ष के सैनिकों की मृत्यु के विषय में सोचकर वह उन पर भी दया कर रहा था। और जब वह इस प्रकार से सोच रहा था तो उसके अंग शिथिल हो रहे थे और मुंह भी सूखा जा रहा था। ऐसे सभी लोगों को युद्ध की ओर उन्मुख देखकर उसे आश्चर्य भी हो रहा था। इसी दयाभाव के कारण वह अंदर से रुदन भी कर रहा था। अर्जुन के ये लक्षण उसकी किसी दुर्बलता के कारण नहीं वरन् उसके हृदय की कोमलता के कारण थे जो भगवान के विशुद्ध भक्त का लक्षण है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भगवान के प्रति अविचल भाव से भक्ति भाव रखता है उसमें देवताओं के से गुण पाये जाते हैं। लेकिन जो भगवान के भक्त नहीं होते उनमें भौतिक योग्यताएं तो रहती हैं लेकिन ये ईश्वरीय गुण नहीं पाये जाते। इन भौतिक योग्यताओं का भक्त के गुणों के समक्ष कोई भी मूल्य नहीं होता।

                                                                                                        श्लोक- 29 से आगे अगली पोस्ट में -


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