सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

3- श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)


अपने बच्चों को आज से
ही"गीता "पढ़ने के लिए
प्रेरित कीजिये ताकि
उनको गीता पर हाथ
रखकर कसम न खानी 
पड़े। 
"संस्कार ही अपराध

को रोक सकते हैं प्रशासन नहीं 

श्रीमद् भगवद्गीता का हिन्दी अनुवाद (ब्याख्या सहित)

अघ्याय-1

कुरूक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

श्लोक-5

     धुष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान।
     पुरूजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः।।

अर्थ-

     इनके साथ ही धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरूजित्, कुन्तिभोज तथा शैब्य जैसे महान शक्तिशाली योद्धा भी हैं।

ब्याख्या-

     वास्तव में दुर्योधन जो कि पांडवों की ब्यूह रचना देखकर अत्यधिक भयभीत हो चुका था वह जब पांडवो की सेना के अनेक शूरवीरों को देखकर और भी अधिक भयभीत हो रहा था। द्रौणाचार्य भी पांडवों की ब्यूह रचना को देख रहे थे, लेकिन दुर्योधन ये सब अपने भय के कारण उनको बता रहा था कि ये-2 योद्धा पांडवों की ओर से युद्ध करने के लिये आये हुये हैं।

श्लोक-6

     युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान।
     सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।

अर्थ-

     पराक्रमी युधामन्यु, अत्यन्त शक्तिशाली उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र तथा द्रौपदी के पुत्र ये सभी महारथी हैं।

श्लोक-7

     अस्माकं जु विशिष्टा से तातत्रबोध द्विजोत्तम।
     नायका मम  सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते।।

अर्थ-

     किन्तु हे आचार्य! आपकी सुचना के लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के विषय में बताना चाहुँगा जो मेरी सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं।

श्लोक-8

     भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिन्जयः।
     अश्वत्थामा विकण्र्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।

अर्थ-

     मेरी सेना में स्वयं आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरीश्रवा आदि हैं जो युद्ध में सदैव विजयी रहे हैं।

ब्याख्या-

     अपने डर पर काबू पाते हुये दुर्योधन अपना ध्यान अपनी सेना की ओर खींचता है और उनका उल्लेख करता है कि वो हमेशा यु़द्ध में विजयी होते रहे हैं। यहाँ पर दुर्योधन का अपनी सेना में उपस्थित शूरवीरों का उल्लेख करने का आशय अपने पक्ष को पाण्डवों के पक्ष से तुलना करने से है। दुर्योधन से भलीभाँति जानता है कि युद्ध शुरू होने में अब कुछ ही समय बाकी है और अब युद्ध होना अवश्यंभावी है और वो चाहता भी यही है, लेकिन पाण्डवों की ब्यूह रचना को देखकर उसके अंदर जो डर की भावना आ चुकी थी वो उस पर काबू पाना चाह रहा था। अन्यथा युद्धभूमि में द्रौणाचार्य से इस प्रकार की बातें करने का कोई आशय नहीं था।

श्लोक-9

     अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
     नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।।

अर्थ-

     मेरी सेना में ऐसे अन्य अनेक वीर भी हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने के लिए हमेशा तैयार हैं। ये अनेक प्रकार के हथियारों से सुसज्जित हैं और युद्धविद्या में काफी निपुण हैं।

ब्याख्या-

     वास्तव में दुर्योधन की सेना में अन्य भी कई योद्धा जैसे-जयद्रथ, कृतवर्मा, शल्य तथा दुर्योधन के अन्य भाई उसके लिये अपने प्राणों की आहुति देने के लिये हमेशा तत्पर रहते थे अर्थात् कुछ भी कर गुजरने के लिये तत्पर थे। लेकिन यहाँ पर तो यह पूर्वनिश्चित है कि ये सभी योद्धा इस समय अधर्मी दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने के कारण इनका कुरूक्षेत्र के युद्ध में मारा जाना अवश्यंभावी है। यहाँ पर अपने सभी मित्रों व अन्य योद्धाओं की सम्मिलित शक्तियों के कारण दुर्योधन अपनी विजय के प्रति आश्वस्त था।

श्लोक-10

     अपर्याप्त तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
     पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।।

अर्थ-

     हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभाँति संरक्षित हैं, जबकि पाण्डवों की शक्ति भीम द्वारा संरक्षित होकर भी सीमित है।

ब्याख्या-

     श्लोक में दुर्योधन ने अपनी और पाण्डवों की तुलनात्मक शक्ति का अनुमान प्रस्तुत किया है। वह सोचता है कि अनुभवी भीष्म के द्वारा संरक्षित होने के कारण उसकी सेना की शक्ति अनन्त है। दूसरी ओर पाण्डवों की सेनाओं की शक्ति को वह सीमित बता रहा है, क्योंकि वहाँ की सुरक्षा का दायित्व एक कम अनुभवी सेनानायक भीम के ऊपर है जिसका अनुभव भीष्म की तुलना में नगण्य है। दुर्योधन की बुद्धि वास्तव में धर्म के क्षेत्र में ज्ञान नहीं रखती थी। उसे यह ज्ञान ही नहीं था कि धर्म का पक्ष किसके साथ है और तीनों लोकों के पालनहार भगवान विष्णु स्वयं पाण्डवों के पक्ष में खड़े हैं, और वो जहाँ पर होंगे जय उनके साथ ही होगी। बस वो समझ रहा था कि तुलनात्मक शक्ति उसके साथ है इसीलिये वो ही विजय होगा। दुर्योधन जो कि सदैव भीम से ईष्र्या करता था क्योंकि वह जानता था कि यदि उसकी कभी मृत्यु होगी तो वो भीम के हाथों ही होगी। यहाँ पर वह अपने आप को विश्वास दिला रहा था और साथ ही अपने गुरू द्रोणाचार्य को कि भीष्म की उपस्थिति में उसकी विजय निश्चित है क्योंकि भीष्म, भीम की तुलना कहीं अधिक अनुभवी सेनापति हैं।

                                                                                                             श्लोक-11 से आगे अगली पोस्ट में -

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें